राजभवन में हुई समन्वय समिति की बैठक में राज्यपाल ने प्रस्ताव खारिज किया


भोपाल । महू विश्वविद्यालय, शहडोल विश्वविद्यालय और भोज विश्वविद्यालय में रैक्टर पद पर नियुक्ति को लेकर राज्यपाल के पास प्रस्ताव रखा गया। जिसे उन्होंने खारिज कर दिया। इन सभी विवि पर शासन जबरिया रैक्टर थोप रहे हैं, क्योंकि सीमित दायरा होने के कारण तीनों विवि में रैक्टर की जरूरत नहीं हैं। प्रदेश में दो दर्जन विवि हैं और सभी के कार्यक्षेत्र व्यापक होने के बाद राजभवन और विवि रैक्टर नियुक्त नहीं कर सके हैं। करीब चार सालों से रैक्टर के पद रिक्त बने हुए हैं। इसके बाद भी तीन विश्वविद्यालयों में तीन रैक्टर के पदों को पद सृजित कर सरकारी खजाने पर फिजूल खर्ची बढ़ाने की व्यवस्था करने की तैयारी थी।
 कैबिनेट से स्वीकृति मिलने के बाद राजभवन में हुई विश्वविद्यालय समन्वय समिति की बैठक में राज्यपाल आनंदी बेन पटेल के सामने इस एजेंडे पर चर्चा की गई। उन्होंने स्वीकृति नहीं दी, बल्कि कुलपतियों को विद्यार्थियों के हित में कार्य करने के निर्देश दे दिए। अब यहां से स्वीकृति नहीं मिलने के बाद शासन अब रैक्टर की नियुक्तियां नहीं करा सकेगा। इसमें भोज मुक्त विवि, शंभूनाथ विवि शहडोल और अंबेडकर विवि महू में शासन रैक्टर का पद तैयार नियुक्ति करने की तैयारी थी। यहां तक उनको भारी भरकम वेतनमान देने के लिए बजट भी मंजूर करने की योजना थी, जिस पर राज्यपाल ने रोक लगा दी, जबकि वर्तमान में प्रदेश के समस्त विवि प्रोफेसर और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं। प्रोफेसरों की कमी से जहां विवि की अध्ययन व्यवस्था चौपट हो रही है। वहीं कर्मचारियों के अभाव में प्रशासनिक व्यवस्था चौपट हो चली है। शासन उनकी नियुक्ति संबंधी फाइल को लंबे समय से रोक रखा है। कुछ कुलपतियों का कहना है कि वर्तमान परिवेश में रैक्टर की आवश्यकता नहीं हैं। अगर जरूरत होती है तो कुलपति रैक्टर नियुक्त कर लेते, क्योंकि उन्हें नियुक्त करने का अधिकार कुलपति के पास होता है।

ये है विवि में व्यवस्था
विश्वविद्यालय अधिनियम 1973 के धारा 15 बी में रैक्टर नियुक्ति की व्यवस्था की गई है। कुलपति के अभाव में रैक्टर विवि की रूटीन फाइलों को पूरा करता है। वर्तमान में कुलपति अवकाश पर जाते हैं, तो वे विवि के वरिष्ठ प्रोफेसर को कुलपति का प्रभार देकर जाते हैं। इससे रैक्टर की आवश्यकता विवि को नहीं रही है। वहीं कुलपति के इस्तीफा देने की स्थिति में रैक्टर कुलपति होते हैं। पिछले कुछ सालों से राजभवन ने रैक्टर को कुलपति का अतिरिक्त प्रभार नहीं दिया है।