फिल्मों की दुनिया में हमेशा से ये धारणा रही है कि स्क्रीन पर दिखने वाला अभिनेता खूबसूरत हो। गोरा रंग लुभावना अंदाज और बॉडीबिल्डर शरीर। बॉलीवुड में एक जमाने तक अभिनेताओं की छवि को इसी दृष्टिकोण से देखा गया लेकिन जब ओमपुरी, नसीरुद्दीन शाह और नाना पाटेकर की एंट्री हुई, अभिनेताओं की गुड लुकिंग को लेकर ये धारणा टूटने लगी। नाना पाटेकर भी उस वक्त हीरो बनने के ऐसे मापदंडों पर खरे नहीं उतरते थे। नाना का स्वभाव काफी सशक्त माना जाता है। इसका एक उदाहरण ये है कि प्रहार फिल्म की शूटिंग के लिए उन्होंने 3 साल तक आर्मी ट्रेनिंग प्रोग्राम का हिस्सा रहे थे। इसके लिए उन्हें कैप्टन की रैंक भी मिली थी।
मगर उनके पास एक्टिंग और दमदार आवाज का जो मिश्रण था, उसने उन्हें अलग पहचान दिलाई। अंकुश, प्रहार, क्रांतिवीर, यशवंत जैसी फिल्मों में उनके किरदार के अंदर एक आक्रोश एक क्रांति देखने को मिली। 
नाना पाटेकर एक गरीब परिवार से थे। नाना ने रोजी रोटी चलाने के लिए जेबरा क्रॉसिंग और फिल्म के पोस्टर्स पेंट किए। वे एक जगह पार्ट टाइम जॉब करते थे जहां पर उन्हें दिन का 35 रुपए और एक दिन का खाना मिलता था।
नाना एक शानदार कुक भी हैं. वे तरह तरह के व्यंजन पकाना पसंद करते हैं और खानों के साथ प्रयोग करते हैं। यही नहीं वे पार्टी के दौरान महमानों के लिए खुद खाना पकाना और सर्व करना पसंद करते हैं।
नाना पाटेकर एक किसान भी हैं और खुद फार्मिंग करना पसंद करते हैं जहां पर वे गेहूं और चावल उगाते हैं। महराष्ट्र में किसानों की मदद के लिए नाना हमेशा आगे रहते हैं। महाराष्ट्र में उनका काफी सम्मान किया जाता है। वे इस खेती से जो पैसा आता है उसे गरीब किसानों में बांट देते हैं.
फिल्मों की बात करें तो वे लगभग 4 दशकों से सिनेमा में सक्रिय हैं। इस दौरान उन्होंने अभिनय के तमाम रंग दर्शकों के सामने पेश किए हैं। चाहें वे संजीदा किरदार हो या फिर कॉमिक, चाहें रोमांस हो या निगेटिव रोल उन्होंने हर तरह के किरदार को खुद में ढाल कर इस तरह पेश किया कि सारे किरदार दर्शकों के जेहन में कैद हो गए